पार्किंसन का इलाज संभव बनाने की दिशा में बड़ी सफलता, जापान में iPS स्टेम सेल तकनीक का कमाल

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लाइव ज़ोन || समीर खान

मरीजों के दिमाग में ट्रांसप्लांट की गईं डोपामाइन बनाने वाली कोशिकाएं, शुरुआती नतीजों से इलाज की नई उम्मीद

टोक्यो, 1 नवंबर 2026। पार्किंसन बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए जापान से बड़ी राहत की खबर सामने आई है। जापानी वैज्ञानिकों ने iPS स्टेम सेल तकनीक की मदद से पार्किंसन के इलाज की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। इस तकनीक में प्रयोगशाला में तैयार की गई डोपामाइन बनाने वाली कोशिकाओं को मरीजों के मस्तिष्क में प्रत्यारोपित किया गया। शुरुआती परीक्षण के नतीजों से पता चला है कि ये कोशिकाएं मस्तिष्क में जीवित रहकर डोपामाइन बनाने में सक्षम हैं। इससे भविष्य में पार्किंसन के इलाज के नए रास्ते खुलने की उम्मीद बढ़ गई है।

क्या है पार्किंसन बीमारी और क्यों होती है?

पार्किंसन एक ऐसी बीमारी है, जो मस्तिष्क में डोपामाइन बनाने वाली कोशिकाओं के धीरे-धीरे खत्म होने के कारण होती है। डोपामाइन एक रसायन है, जो शरीर की गतिविधियों और मांसपेशियों के नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इसकी कमी होने पर मरीज के हाथ-पैर कांपने लगते हैं। चलने-फिरने में परेशानी होती है और शरीर की गतिविधियां धीमी पड़ने लगती हैं। कई मरीजों को संतुलन बनाने और रोजमर्रा के काम करने में भी कठिनाई होती है।

iPS स्टेम सेल तकनीक से कैसे होगा इलाज?

जापान के क्योटो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इस तकनीक पर काम किया है। इसमें विशेष कोशिकाओं को प्रयोगशाला में विकसित करके डोपामाइन बनाने वाली न्यूरॉन कोशिकाओं के शुरुआती रूप में तैयार किया जाता है।

इसके बाद इन कोशिकाओं को मरीज के मस्तिष्क के एक खास हिस्से पुटामेन में प्रत्यारोपित किया जाता है। उम्मीद है कि ये कोशिकाएं मस्तिष्क में डोपामाइन का उत्पादन करके बीमारी से प्रभावित गतिविधियों को बेहतर बनाने में मदद करेंगी।

सात मरीजों पर हुआ परीक्षण, चार में दिखा सुधार

क्योटो विश्वविद्यालय अस्पताल में किए गए पहले चरण के परीक्षण में 50 से 69 वर्ष की उम्र के सात मरीजों को शामिल किया गया था। मरीजों के मस्तिष्क के दोनों तरफ डोपामाइन बनाने वाली कोशिकाओं के शुरुआती रूप प्रत्यारोपित किए गए।

24 महीने तक मरीजों की निगरानी की गई। परीक्षण के दौरान किसी मरीज में गंभीर प्रतिकूल प्रभाव सामने नहीं आया। जांच में प्रत्यारोपित कोशिकाएं सक्रिय मिलीं और उनसे डोपामाइन का उत्पादन होने के संकेत मिले।

प्रभाव के आकलन में शामिल छह मरीजों में से चार के पार्किंसन से जुड़े कुछ शारीरिक लक्षणों में सुधार दर्ज किया गया। पांच मरीजों के कुछ अन्य लक्षणों में भी सुधार देखा गया। हालांकि, यह छोटा परीक्षण था और इसके आधार पर सभी मरीजों के लिए इलाज की सफलता का दावा नहीं किया जा सकता। kuhp.kyoto-u.ac.jp+1

जापान में इलाज को मिली सशर्त मंजूरी

इस शोध को आगे बढ़ाते हुए जापान में मार्च 2026 में iPS कोशिकाओं से तैयार दवा आधारित उपचार को सशर्त और समय-सीमित मंजूरी दी गई। इस उपचार का नाम ‘अम्शेप्रि’ (Amchepri) है।

क्योटो विश्वविद्यालय अस्पताल के अनुसार, अक्टूबर 2026 से मरीजों में इस उपचार के तहत प्रत्यारोपण की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। अस्पताल ने बताया कि प्रत्यारोपण कराने वाली पहली मरीज की हालत ऑपरेशन के बाद अच्छी रही और उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। अब उनकी आगे निगरानी की जा रही है। kuhp.kyoto-u.ac.jp+1

क्या अब पूरी तरह ठीक हो जाएगी पार्किंसन बीमारी?

इस नई तकनीक से उम्मीद जरूर बढ़ी है, लेकिन इसे पार्किंसन का पूरी तरह ठीक करने वाला इलाज कहना अभी जल्दबाजी होगी। वैज्ञानिकों को यह समझने के लिए और अध्ययन करने होंगे कि प्रत्यारोपित कोशिकाएं लंबे समय तक कितनी प्रभावी रहती हैं और मरीजों को कितना लाभ मिलता है।

फिलहाल यह तकनीक उन मरीजों के लिए भविष्य में एक नया विकल्प बन सकती है, जिन्हें मौजूदा दवाओं से पर्याप्त राहत नहीं मिल रही है।

चिकित्सा जगत के लिए क्यों अहम है यह उपलब्धि?

iPS स्टेम सेल तकनीक की खासियत यह है कि इसकी मदद से प्रयोगशाला में विशेष प्रकार की कोशिकाएं तैयार की जा सकती हैं। इससे शरीर में नष्ट या खराब हो चुकी कोशिकाओं की जगह नई कोशिकाएं पहुंचाने की संभावना बनती है।

पार्किंसन के इलाज में मिली यह सफलता भविष्य में अन्य तंत्रिका संबंधी बीमारियों के उपचार के लिए भी नए शोध का आधार बन सकती है। हालांकि, इसके लिए लंबे समय तक सुरक्षा और प्रभाव का अध्ययन जरूरी होगा।